Monday, May 13, 2019

वाचस्पतिमिश्रकृत सांख्यतत्त्व कौमुदी

व्याख्याकार - पं श्री ज्वालाप्रसाद गौड़

श्रीगणेशाय नमः
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अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां नमामः।
अजा ये तां जुषमाणां भजन्ते जहात्येनां भुक्तभोगां नुमस्तान्।। १ ।।

अर्थ:
हम इस चराचर विश्वरूप बहुत सी प्रजाओं की सृष्टि करनेवाली, नित्य, एक रजोगुण, सत्वगुण, तमोगुणात्मिका अर्थात त्रिगुणात्मिका प्रकृति को नमस्कार करते हैं और उन पुरुषों को भी हम नमस्कार करते हैं, जो पुरुष भी नित्य तथा अनादि हैं; एवं शब्दादि विषय सम्बन्धी उपभोगों को प्रदान करनेवाली उस प्रकृति को भजते हैं तथा अन्त में भुक्तभोग इस प्रकृति को अनात्म वास्तु समझकर छोड़ देते हैं ।

*यहाँ लोहित शुक्ल कृष्ण वर्ण क्रमश: रजस, सत्त्व तथा तमस-त्रिगुण के लिए प्रयुक्त है। इन तीन गुणों से युक्त एक अजा (अजन्मा) तत्त्व है। इसका भोग करता हुआ एक अज तत्त्व है तथा भोग रहित एक और अज तत्त्व (परमात्मा) है। इस प्रकार यह वाक्य त्रिगुणात्मक प्रसवधर्मि (सृजन करने वाली) प्रकृति का उल्लेख भी करती है। परमात्मा को मायावी कहकर प्रकृति को ही माया कहा गया है।
* इस प्रसंग में पुन: मायावी और माया से बन्धे हुए अन्य तत्त्व जीवात्मा का उल्लेख भी है।*

कपिलाय महामुनये मुनये शिष्याय तस्य चासुराये ।
पञ्चशिखाय तथेश्वरकृष्णायैते नमस्येमाः ।। २ ।।

अर्थ:
इसके पश्चात हम महामुनि कपिल एवं उनके शिष्य मुनि आसुरि तथा आसुरि के शिष्य पञ्चशिख और ईश्वरकृष्ण, इनको भी हम नमस्कार करते हैं ।

दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदभिघातके हेतौ ।
दृष्टे सापार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥ १ ॥

अन्तःकरण वर्ती त्रिविध दुःखों से चैतन्य शक्ति को भी अपाय होता है, ऐसी भावना उत्पन्न होने पर इनका प्रतिकार किन उपायों से होगा, यह जानने की अभिलाषा होना सहज सिद्ध बात है, यदि कोई कहे कि लोक सिद्ध दृष्ट उपाय सुकर होते हैं, तो शास्त्रीय उपाय का क्या काम? परन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि लौकिक उपायों से दुःख अवश्य ही निवृत्त हो जाएगा, ऐसा नहीं कह सकते, अतएव दुःखत्रयों के निवृत्ति होने के लिए शास्त्रीय उपायों को काम में अवश्य लाना चाहिए ।

इस शास्त्र के विषय में विद्वानों की जिज्ञासा नहीं होवेगी, ऐसा हम प्रतिपादन करते परन्तु कब ?
यदि संसार में दुःख - इस पदार्थ का अभाव होता ? अथवा दुःख होकर भी उसका नाश किसी को अभीष्ट नहीं होता ।
अथवा दुःख नाश करने की इच्छा होते हुए भी दुःख नाश करना अशक्य होता (क्योंकि शास्त्रों में दुःख पदार्थ नित्य बताया गया है अर्थात नित्य होने से नाश होना अशक्य ही है )
तीसरा विकल्प कहते हैं,
अथवा दुःख नाश जब भी शक्य है तो शास्त्र विषय का ज्ञान होना यह सच्चा उपाय न होता ।
चौथा, अथवा कोई दूसरा सुलभ उपाय होता, तब हम प्रतिपादन करते, परन्तु उपरोक्त प्रकार में से यहाँ पर एक भी नहीं है, यदि कहें कि कैसे ? तो नीचे लिखा जाता है, संसार में दुःख है ही नहीं अथवा होकर भी उसका नाश किसी को अभीष्ट नहीं, ऐसा तो कह ही नहीं सकते, क्योंकि इस संसार में आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक; तीन प्रकार का दुःख अनुभव से जाना जाता है ।

उपरोक्त दुःखत्रयों में पहिला जो आध्यात्मिक दुःख है उसके दो भेद हैं, शारीर और मानस, शरीरान्तर्गत वात, पित्त और कफ इन तीनो दोषों के विषमता से होने वाला दुःख शारीरिक दुःख कहलाता है तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, ईर्ष्या, विषाद इष्ट वस्तु का अदर्शन इत्यादि के योग से होने वाला दुःख मानस कहलाता है । यह सब शरीर के आन्तरिक उपाय से साध्य होने के कारण आध्यात्मिक कहलाते हैं ।

शरीर को छोड़कर उसके बाहरी उपाय द्वारा साध्य-दुःख के आधिभौतिक और आधिदैविक, ऐसे दो प्रकार हैं ।

उक्त प्रकार में - मनुष्य, पशु, मृग, पक्षी, सर्प, वृक्षादि स्थावर पदार्थ; इनके योग से होनेवाला दुःख आधिभौतिक दुःख है तथा यज्ञ, राक्षस, विनायक ग्रह, इनके योग से होने वाला जो दुःख है, वह आधिदैविक दुःख है ।

उपरोक्त त्रिविध दुःख प्रत्येक प्राणी के अनुभव में आने योग्य हैं तथा वे दुःखत्रय, रजोगुण का ही एक प्रकार का परिणाम है, इस कारण वे दुःखत्रय नहीं हैं, ऐसा किसी काल में नहीं कह सकते तथा अन्तः करण के ऊपर धर्मरूप से रहने वाले इन त्रिविध दुःखों से चैतन्य शक्ति का "यह वस्तु हमको अनिष्टप्रद है" इस भावना से सम्बन्ध होने के कारण इस अनिष्ट दुःख का नाश हो, ऐसी जिज्ञासा होना योग्य ही है, दुःख, यह रजोगुण का कार्य है, और रजोगुण नित्य है अतः नित्य होने के कार्य का नाश होना, यह बात अशक्य है । अर्थात कारण का अस्तित्व रहने से कार्य का भी आस्तित्व रहता ही है क्योंकि कारण रहते हुए कार्य का सर्वथैव नाश नहीं होता । यह सत्य है, परन्तु उसका अभिभव अर्थात - प्रतिकार होना शक्य है, उस दुःख का प्रतिकार कैसे कर सकते हैं,  इसका विवेचन आगे बतलाया गया है ।

यदि यहाँ पर कोई ऐसी शंका करे कि दुःख है तथा यह नाशवान भी है और इसका प्रतिकार भी शक्य है तथा दुःखप्रतिकारार्थ शास्त्रीय उपाय भी है, तब लोक-प्रसिद्ध सुलभ उपायों को छोड़कर अनेक जन्मों में वह भी महत्कष्ट से साध्य होनेवाले शास्त्रीय उपायों के झंझट में कौन पड़ेगा ? क्योंकि आज समाज में भी कहावत है कि गृहाङ्गण में जो शहत मिल जावे, तो फिर उसके लिए पर्वत पर कौन जावेगा ? वैसे ही अभीष्टार्थ यदि सहज में ही सिद्ध हो, तो उसके लिए ऐसा कौन विद्वान् है जो यत्न करेगा ? "अब दुःख प्रतिकारार्थ सुलभ दृष्ट उपाय बतलाते हैं" शारीरिक दुःख के प्रेतकारार्थ उत्तम वैद्यों के बतलाये हुए सैकड़ों उपाय हैं और मानसिक दुःख निवारणार्थ भी उत्तम स्त्री, अन्न, पान, अभ्यंग, वस्त्र, अलंकार इत्यादि उपाय हैं तथा इनके प्राप्त होने से दुःख का प्रतिकार होना शक्य है । ऐसे ही - आधिभौतिक दुःख के प्रीकारार्थ निति शास्त्राभ्यास निपुणता, शान्त स्थान में वास्तव्य इत्यादि सहज उपाय हैं और आधिदैविक दुःख के लिए मन्त्र, मणि, औषध इत्यादि उपाय अति सुलभ हैं और प्रतिकार भी तुरन्त हो सकता है इस कारण से शास्त्रीय उपायों की जिज्ञासा होना अयुक्त है "परन्तु इन लौकिक उपायों से अभिलषित दुःख निवृत्त होना हिमजल तुल्य है, किन्तु यह स्थूल दृष्टी वालों को क्या मालूम ।

पूर्वोक्त शंकाओं का निराकरण करते हैं कि यह पूर्वोक्त स्थूल दृक मनुष्य कृतविधान ठीक नहीं है, क्योंकि दृष्ट उपाय हैं परन्तु उन उपायों से दुःख निवृत्त अवश्यमेव होगा ही, ऐसा नहीं कह सकते यदा कदाचित हो भी जावे तो भी उस दुःख कि तथात्सदृश अन्य दुःखों की उत्पत्ति नहीं होवेगी ऐसा अवाधित सिद्धान्त नहीं कह सकते, अस्तु, प्रकृति शास्त्र को दुःख निवृत्ति ही मात्र अभीष्ट नहीं है किन्तु एकान्तिकात्यन्तिक दुःख निवृत्ति अभीष्ट है । 'एकान्त' कहते हैं अवश्यमेव दुःख निवृत्त होने को और 'अत्यन्त' कहते हैं, एक बार निवृत्त दुःख के पुनः न उत्पन्न होने को तो इन दोनों बातों को दृष्ट उपायों में अभाव है अतः मूल में "एकान्तात्यन्ततो भावाद् " कहा है।

यथाविधि रसायन, कामिनी निति शस्त्राभ्यास, मणि, मंत्रादि यद्यपि लौकिक उपाय सुकर हैं तथापि आध्यात्मिक दुःख निवृत्त्यर्थ उनकी कुछ भी उपयोगिता नहीं देखी जाती इसी कारण इनका वे 'अनैकान्तकत्व' कोटि में समझना चाहिए । क्वचित स्थल में उनकी उपयोगिता भी देखी जाती है परन्तु दुःख की अत्यन्त निवृत्ति नहीं होती अतैव इनको 'अनात्यन्तिकत्व' कहते हैं  अर्थात पूर्वोक्त प्रकार के दोषों द्वारा ग्रस्त होने से (मृगजलवत) नोरूप योगी दृष्ट उपायों के झगडे में न पढ़कर विद्वानों को शास्त्रीय(आध्यात्मिक) उपाय आवश्यकीय है ।

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यहाँ यह निश्चित है कि अभिलषित अर्थ(विषय) का प्रतिपादन करनेवाले उपदेष्टा व्यक्ति का वचन (वाक्य) प्रेक्षावानों(बुद्धिमानों) के लिए श्रद्धेय और आदरणीय होता है । और अप्रतिपित्सित(अजिज्ञासित) विषय का प्रतिपादन करने वाले व्यक्ति की प्रेक्षावान लोग - यह न तो लोकव्यवहार का अभिज्ञ(जानने वाला) है और न परीक्षक(प्रमाण द्वारा विषय का विवेचन करनेवाला) ही है - इस प्रकार से उन्मत्त (पागल = बेवक़ूफ़) की तरह उपेक्षा कर देते हैं और इन प्रेक्षावान लोगों का जो जिज्ञास्य विषय है, जिसका परम ज्ञान पुरुषार्थ(मोक्ष) की प्राप्ति का साधन है और आरम्भ किये जाने वाले सांख्यशास्त्र में प्रतिपाद्य पच्चीस तत्त्वात्मक विषयों का यथार्थ ज्ञान ही मोक्ष का साधन है और वह ज्ञान सांख्यशास्त्र से होता है; अतः कारिकाकार ईश्वरकृष्ण उसी सांख्यशास्त्र विषय सम्बन्धी जिज्ञासा का अवतरण देते हैं - 'दुःखत्रयाभिघातात्' इत्यादि कारिका से -
करिकार्य - आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक - इन तीन प्रकार के दुखों का आत्मा के साथ अभिघात(सम्बन्ध) होने से विनाशकारणीभूत हेतु को जानने की इच्छा होती है कि दुःख सामान्य के विनाश का कारन कौन है ? यदि लौकिक दृष्ट उपाय से ही वह जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है तो फिर क्या आवश्यकता है इतने गहन शास्त्राध्ययन की ?

इसका उत्तर दिया कि दृष्ट लौकिक उपाय औषधि सेवन आदि से दुःख-निवृत्ति होती है, किन्तु एकान्त-एकान्तिक रूप से तथा अत्यन्त-आत्यन्तिक रूप से नहीं होती है । ( एकान्तम् = दुःखनिवृत्तेर्वश्यं भावः, अत्यन्तम् = निवृत्तस्य दुःखस्य पुनरनुत्पत्तिः, तयोरभावात्) अर्थात दृष्टोपाय से दुःख की निवृत्ति एकान्तिक तथा आत्यन्तिक रूप से कदापि नहीं होती है, इसीलिए दुःख की एकान्तिक तथा आत्यन्तिक रूप से निवृत्ति के लिए सांख्यशास्त्रोक्त उपाय ही ठीक है ।

है; इस प्रकार से सांख्यशास्त्र के विषय को जानने की इच्छा नहीं हो सकती है, यदि 'दुःख' नाम की वस्तु ही जगत में न हो ? होने पर भी उसे छोड़ने की इच्छा न होती हो, छोड़ने की इच्छा न होते हुए भी दुःख का समुच्छेद(निवृत्ति) अशक्य हो अर्थात शक्तिसाध्य न हो और वह दुःख की समुच्छेदता दो प्रकार से हो सकती है, या तो दुःख नित्य हो अथवा दुःख के उच्छेद(निवृत्ति) के उपाय का ज्ञान न हो अथवा दुःख की निवृत्ति सम्भव होने पर भी सांख्यशास्त्त के विषय का ज्ञान दुःख निवृत्ति(दुःखोच्छेद) का उपाय न हो अथवा उपाय होने पर भी सांख्यशास्त्र प्रतिपाद्य तत्त्वज्ञान की अपेक्षा कोई और दूसरा सरल उपाय हो तब भी सांख्यशास्त्र-प्रतिपाद्य तत्वज्ञान की जिज्ञासा करना व्यर्थ है ।

परन्तु संसार में दुःख नहीं है, ऐसा भी सम्भव नहीं है; दुःख अनुभव सिद्ध है, अतः अवश्य है अथवा दुःख अजिहासित है अर्थात छोड़ने की इच्छा का विषय नहीं है, यह भी नहीं कहते; इसी अभिप्राय से कारिकाकार कहते हैं - 'दुःखत्रयाभिघातादिति' । तीन प्रकार के दुःख हैं - (१) आध्यात्मिक (२) आधिभौतिक (३) आधिदैविक । इनमें आध्यात्मिक दुःख दो प्रकार का है - शारीरिक और मानसिक । वात, पित्त, कफ (श्लेष्मा) - इनकी विषमता से उत्पन्न दुःख शारीरिक दुःख कहलाता है; और काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, ईर्ष्या तथा विषाद - इन सात कारणों से उत्पन्न एवं स्वाभीष्ट विषय(गुलाबजामुन) आदि की प्राप्ति न होने पर जो दुःख होता है वह मानस दुःख है । यह सब दुःख आन्तरोपायसाध्य होने के नाते आध्यात्मिक दुःख कहलाते हैं ।

और बाह्योपाय दुःख दो प्रकार का होता है - आधिभौतिक तथा आधिदैविक । उनमें आधिभौतिक दुःख - मनुष्य, पशु, पक्षी, सरीसृप तथा स्थावर (स्थितिशील भूमि वृक्षादि ) के आधार पर उत्पन्न होने वाला दुःख आधिभौतिक दुःख कहलाता है तथा यक्ष, राक्षस, विनायक(विघ्नोत्पादक देवजातिविशेष) एवं शनि ग्रहों आदि के आवेश(नाराज़गी) से होने वाला दुःख आधिदैविक दुःख कहलाता है । अतः प्रत्येक आत्मा को वेदनीय अर्थात अनुभूत होने वाले तथा रजोगुण के परिणामभूत इस दुःख का कदापि प्रत्याख्यान = निराकरण नहीं किया जा सकता है कि दुःख नाम की कोई वस्तु-पदार्थ संसार में है ही नहीं, अत्यादि रूप से । इसलिए अंतःकरणवर्ती इन तीन दुखों के साथ चेतनाशक्ति(पुरुष) का प्रतिकूलवेदनीय होने वाले अभिसम्बन्ध को ही अभिघात कहा है ।

दुःख के प्रतिकूलवेदनीय होने से ही उसके प्रतिकूलवेदनीयत्व को दुःख के परिहार की इच्छा का कारण बतलाया है । यद्यपि सांख्य के सत्कार्यवाद को स्वीकार करने के नाते दुःख भी सत् है, अतः उसका निरोध=विनाश नहीं हो सकता है । तथापि उसका अभिभव=अनुभूति न होना, किया जा सकता है । यह आगे स्पष्ट हो जाएगा ।


दृष्टवादानुश्रविकः  स ह्यविशुद्धि क्षयातिशययुक्तः ।
तद्विपरीतः श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञानात् ।। २ ।।

अर्थ:
जब कि वह वैदिक उपाय अविशुद्धि(मलिन), क्षय(नाशवान) तथा अतिशय आदि दोषयुक्त है, तब वैदिक कर्म कलाप भी लौकिक उपाय के सदृश ही है और ऐसा होने के कारण उस दोषयुक्त वैदिक उपाय से विपरीत अर्थात अशुद्धता रहित हमारा वैदिक उपाय ही अति उत्तम है क्योंकि इसकी (हमारे शास्त्रीय उपाय की ) उत्पत्ति व्यक्त(व्यक्त्कार्य) और अव्यक्त(कारण) तथाज्ञ(चैतन्य पुरुष) इनके विवेक ज्ञान से होती है ।

व्याख्या - गुरु पाठ के अनन्तर जो श्रवण किया जाता है अर्थात जिसका केवल गुरु परंपरा से श्रवण होता है तथा कोई व्यक्ति विशेष से ग्रथित नहीं किया जाता, वही अनुभव अर्थात वेद है (तत्रेति) उसमें रहनेवाला या उससे मिला हुआ या उससे प्राप्त किया गया जो कर्म समूह है, वह 'आनुश्रविक' है । परन्तु वह आनुश्रविक कर्मसमूह भी लोकसिद्ध उपाय सदृश ही है,(एकान्तिकेति) क्योंकि त्रिविध दुःखों का नियम से तथा समूल नाश करने में (उपयोगिता) कारिणीभूत न होना यह दोष उभयत्र सदृश ही है ।

यद्यपि इस कारिका में आनुश्रविक अर्थात वैदिक, ऐसा यद्यपि सामान्यतः निर्देश किया है, तथापि उस शब्द का 'कर्मकलाप' मात्र अभिप्राय समझना अर्थात वैदिक कर्मसमूह मात्र दुःखोच्छेद के लिए निरुपयोगी है, अन्य भाग नहीं, क्योंकि विवेक ज्ञान, यह भी तो आनुश्रविक ही है, जैसे वेद ही ने विवेक ज्ञान विषय में "अये मैत्रेयी आत्मा को जानना चाहिए" ऐसा विधान किया है, आत्मा को जानना, इसका अर्थ आत्मा को प्रकृति से भिन्न समझना ऐसा है (न स ) तद्वत "जो आत्मा को जानता है, वह पुनः जन्म मरण की परम्परा में नहीं गिरता" ऐसी श्रुति आत्म ज्ञान का परम फल बतलाती है ।

दृष्टवादानुश्रविकः  स ह्यविशुद्धि क्षयातिशययुक्तः ।
तद्विपरीतः श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञानात् ।। २ ।।

अर्थ:
जब कि वह वैदिक उपाय अविशुद्धि(मलिन), क्षय(नाशवान) तथा अतिशय आदि दोषयुक्त है, तब वैदिक कर्म कलाप भी लौकिक उपाय के सदृश ही है और ऐसा होने के कारण उस दोषयुक्त वैदिक उपाय से विपरीत अर्थात अशुद्धता रहित हमारा वैदिक उपाय ही अति उत्तम है क्योंकि इसकी (हमारे शास्त्रीय उपाय की ) उत्पत्ति व्यक्त(व्यक्त्कार्य) और अव्यक्त(कारण) तथाज्ञ(चैतन्य पुरुष) इनके विवेक ज्ञान से होती है ।

व्याख्या - गुरु पाठ के अनन्तर जो श्रवण किया जाता है अर्थात जिसका केवल गुरु परंपरा से श्रवण होता है तथा कोई व्यक्ति विशेष से ग्रथित नहीं किया जाता, वही अनुभव अर्थात वेद है (तत्रेति) उसमें रहनेवाला या उससे मिला हुआ या उससे प्राप्त किया गया जो कर्म समूह है, वह 'आनुश्रविक' है । परन्तु वह आनुश्रविक कर्मसमूह भी लोकसिद्ध उपाय सदृश ही है,(एकान्तिकेति) क्योंकि त्रिविध दुःखों का नियम से तथा समूल नाश करने में (उपयोगिता) कारिणीभूत न होना यह दोष उभयत्र सदृश ही है ।

यद्यपि इस कारिका में आनुश्रविक अर्थात वैदिक, ऐसा यद्यपि सामान्यतः निर्देश किया है, तथापि उस शब्द का 'कर्मकलाप' मात्र अभिप्राय समझना अर्थात वैदिक कर्मसमूह मात्र दुःखोच्छेद के लिए निरुपयोगी है, अन्य भाग नहीं, क्योंकि विवेक ज्ञान, यह भी तो आनुश्रविक ही है, जैसे वेद ही ने विवेक ज्ञान विषय में "अये मैत्रेयी आत्मा को जानना चाहिए" ऐसा विधान किया है, आत्मा को जानना, इसका अर्थ आत्मा को प्रकृति से भिन्न समझना ऐसा है (न स ) तद्वत "जो आत्मा को जानता है, वह पुनः जन्म मरण की परम्परा में नहीं गिरता" ऐसी श्रुति आत्म ज्ञान का परम फल बतलाती है ।

कर्मसमूह दुःखोच्छेद के लिए निरुपयोगी है, इसका कारण बतलाते हैं -
(सह्य) वह वैदिक उपाय अविशुद्ध, क्षय, अतिशय इन तीनो दोषों से युक्त है, (अविशुद्धि:) सोम यागादि सत्र, पशुओं की हिंसा, बीजों का नाश इत्यादि दोषयुक्त कर्मों के सहाय से साध्य होता है, बस यही उसकी (अविशुद्धि) अपवित्रपना है, जैसे भगवान् पञ्चशिखाचार्य जी ने वैदकीक कर्म समूह को स्वल्प सङ्कर, सपरिहार तथा साप्रत्यव मर्ष, ऐसा बतलाया है, अब प्रत्येक शद्बों का अर्थ बतलाता हूँ -

स्वल्प सङ्कर - इसका अर्थ यह है कि ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों से उत्पन्न होने वाले प्रधान अपूर्व का तथा पशु हिंसादिकों से उत्पन्न हुआ अनर्थकारक स्वल्प अपूर्व से संसर्ग होना अर्थात मेल होना स्वल्प सङ्कर कहलाता है अर्थात ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों से उत्पन्न होने वाला प्रधानीभूत धर्म का पशु हिंसादि अनर्थकारक अप्रधानीभूत अधर्म का एक समानाधिकरण में रहना ही सङ्कर कहलाता है, पुण्य की अपेक्षा अलप होने से स्वल्प कहा है ।

सपरिहारः - बहुत से प्रायश्चितों द्वारा उसका परिहार (निष्कृति) हो सकता है, परन्तु प्रमाद से या स्मृति विभ्रम से भूल कर, प्रायश्चित न किया गया तो प्रधान कर्म के विपाक समय में अर्थात मुख्य कर्म का स्वर्गादिक फल जिस समय प्राप्त होता है, उसी समय अप्रधान हिंसाजन्य अधर्म भी दुःख रूप से अनुभव करने में आता है, परन्तु यद्यपि ऐसा प्रकार है, तथापि यावत्काल पर्यन्त वह अनर्थ उत्पन्न करते रहे, तावत् काल पर्यन्त वह सप्रत्यव मर्ष रहता है अर्थात सहिष्णुता के साथ रहता है सारांश फल भोगने वाला पुरुष उसको सहता है । 

चिरकालिक पुण्य संचय से प्राप्त स्वर्ग रुपी अमृत सरोवर में स्नान करने वाले कुशल कर्म ही अल्प पाप से प्राप्त दुखाग्नि की चिंगारी को सहन करते हैं अर्थात बहुत सी सुख राशि के सामने दुःख कणिका कुछ भी मालूम नहीं पड़ती, यहाँ तक पूर्वोक्त पञ्च शिखाचार्य का मत बतलाया गया तथा उससे वैदिक कर्मसमूह अविशुद्ध है यह निश्चित हुआ, परन्तु इस पर मीमांसकों की कोटि नहीं है ऐसा नहीं, जो कोटि है वह आगे बतलाई जाती है, यदि मीमांसक कहें कि -

किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो, यह सामान्य शास्त्र (अग्नि शोमीयं पशुमालभेत) अग्निष्टोम सम्बन्धी पशुओं की हिंसा करें, इस विशेष शास्त्र से बाधित होता है, परन्तु यह मीमांसकों का कथन हमको युक्त नहीं मालूम पड़ता क्योंकि उपरोक्त सामान्य और विशेष वाक्य में हमको किञ्चित भी विरोध नहीं देख पड़ता, अतः वे जैसा कहते हैं, वैसा यहाँ नहीं है, कारण जिन दोनों में विरोध हुआ करता है, उनमें से जो बली होता है, वह दुर्बल को बाधा किया करता है, ऐसा नियम तथा अनुभव भी है, परन्तु उपरोक्त वाक्यों में विरोध न होकर उनका भिन्न-२ विषय है; यदि कहो कि कैसे? तो बताता हूँ - "किसी प्राणी की हिंसा मत करो" यह निषेध हिंसा को अनर्थ हेतुत्व सूचित कराता है - अर्थात हिंसा का अर्थोत्पादक है, परन्तु यज्ञ के उपयोगी नहीं है, ऐसा सूचित नहीं कराता तथा 'अग्निष्टोम में हिंसा करें' यह जो दूसरा वाक्य है, वह यह सूचित करता है कि पशुओं की हिंसा यज्ञ के उपयोगी है, बस इतना ही कहना है परन्तु उससे अनर्थ नहीं होता ऐसा कुछ वह नहीं कहता ।
हिंसा अनर्थ का हेतु होना तथा यज्ञ के उपयोगी होना, इन दोनों में किसी तरह का विरोध नहीं है, इस उपरोक्त शास्त्रार्थ से - हिंसा, पुरुष को दोषी भी करेगी तथा यज्ञ के उपयोगी भी होवेगी यह सिद्ध हो चुका, अस्तु, मूल कारिका में जो "क्षयातिशय" कहा, अब वह वैदिक उपाय क्षय तथा अतिशय दोष युक्त कैसे हैं, यह बतलाते हैं ।

क्षय (नाश) तथा अतिशय ये दोष वस्तुतः स्वर्गादि फलों में विद्यमान रहते हैं, न कि यज्ञों में, परन्तु उन्हीं दोषों का यज्ञ में उपचार किया जाता है ।

अब स्वर्गादिकों में अतिशय दोष कैसे है, यह बतलाया जाता है । ज्योतिष्टोम यज्ञ केवल स्वर्ग के साधक हैं तथा वाजपेयादि यज्ञ स्वराज्य के भी साधक हैं अर्थात उससे इन्द्र बना जा सकता है; तो इन दोनों में अतिशय दोष आ गया, क्योंकि दुसरे की संपत्ति का उत्कर्ष हुआ देख, जिसकी संपत्ति हीन है, ऐसे पुरुष को दुःख होना प्रकृति सिद्ध बात है । एक की अपेक्षा दुसरे को उत्तम स्थिति में रहना, यही अतिशय कहाता है ।

अब मीमांसकों का अमरत्व के विषय में क्या कहना है, वो बताते हैं । हमनें सोमपान किया और अमर हुए, प्रकृत वाक्य में 'अमर' का अर्थ है चिरकाल तक स्थिर रहने वाला । उपरोक्त अर्थ करने के विषय में प्रमाण भी है । प्रलय पर्यन्त स्थिर रहनेवाले स्थान को अमृतत्व, ऐसा कहा जाता है ।
यागादिकों से अमृतत्व की प्राप्ति नहीं होती, यह जो पूर्व में प्रतिज्ञा की गयी है, उसी के दृढीकरणार्थ श्रुति की साक्षी देते हैं । यथा - कर्म से, प्रजा से तथा धन से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, वह तो केवल त्याग साध्य विवेक ज्ञान से ही लाभ होता है, तद्वत 'हृदयान्तर्गत स्थित सुखरूप एवं स्वयंप्रकाश ब्रह्म ज्ञान से प्राप्त करके महात्मा यति उसी में लीन हो जाते हैं ।
तथा कर्म करनेवाले, द्रव्य की इच्छा करनेवाले, संतति उत्पन्न करनेवाले ऋषि मृत्यु को प्राप्त हुए (मृत्यु अर्थात स्वर्गादि क्षयी फल) दुसरे ज्ञानी ऋषिकर्म के योग से अप्राप्य अमृतत्व (मोक्ष) को ज्ञान से प्राप्त हुए इत्यादि अनेक श्रुतियाँ, कर्म से मोक्ष प्राप्त नहीं होती, ऐसा स्पष्ट प्रतिपादन करती हैं ।

इन सब बातों का विचार करके ग्रन्थकार कहते हैं, वह सोमयागादि यज्ञ अविशुद्ध, अनित्य व सातिशय फल देने वाले दुःखनाशक वैदिक उपाय से विपरीत (भिन्न) हिंसादि दोषरहित नित्य व निरतिशय फल देनेवाला उपाय अतिश्रेष्ठ है, क्योंकि वह पुरुष पुनः जन्म मरण की परम्परा में नहीं प्राप्त होता, इस अर्थ की श्रुति साक्षी है ।

परन्तु हमारे उपरोक्त कथन में एक शंका उत्पन्न हो सकती है, कि विवेक ज्ञान से प्राप्त होने वाला मोक्ष, यह भी अनित्यत्व मोक्षग्रस्त है क्योंकि "जो जो कार्य हैं, वे वे अनित्य हैं", इस व्याप्ति से मोक्ष को भी अनित्यता प्राप्त होती है, परन्तु यह शंका मिथ्या है क्योंकि जो जो भाव कार्य में हैं वे वे अनित्य हैं अर्थात कार्यत्वेन अनित्यता सिद्ध करना ठीक नहीं है, कार्यत्वेन भाव कार्य को ही अनित्यता प्राप्त होती है, दुःखध्वंस अर्थात दुःख का नाश वह कार्य है परन्तु भावरूप नहीं है, अतएव दुःखाभावरूप मोक्ष अनित्य नहीं है ।

इस उपरोक्त विवेचन का यह सार है कि उस दुःखनाशक वैदिक उपाय से, सत्वपुरुषान्यता प्रत्यय (प्रधान व पुरुष, ये दोनों भिन्न हैं ऐसा साक्षात्कार होना हिन् सत्वपुरुषान्यता प्रत्यय कहलाता है ) यह दुःखनाशक उपाय विपरीत है तथा इसी कारण से वह अधिक कल्याणकारक है । वैदिक उपाय, वेदविहित होने के कारण तथा उन उपायों से दुःख का भी किञ्चित नाश होने के कारण प्रशस्त है, तद्वत प्रकृति और पुरुष भिन्न हैं, यह प्रत्यय भी प्रशस्त है, परन्तु इन दोनों प्रशस्त उपायों में से दूसरा अधिक श्रेयस्कर है, क्योंकि इसमें हिंसा दोष बिलकुल न होकर इसके द्वारा मिला हुआ फल, नित्य और निरतिशय होता है ।

इस विवेक ज्ञान की उत्पत्ति कैसे होती है, यह बताते हैं । व्यक्त, अव्यक्त तथा 'ज्ञ', इन तीनों के ज्ञान द्वारा इसकी उत्पत्ति होती है । विज्ञान-विवेक द्वारा होनेवाला ज्ञान, यह पृथक-पृथक हैं, ऐसा ज्ञान(व्यक्त ज्ञान) व्यक्त अर्थात कार्य, इसी का प्रथम ज्ञान होता है, पश्चात् उसके कारण का, अर्थात अव्यक्त का ज्ञान होता है तथा ये दोनों (व्यक्ताव्यक्त) कोई और ही के लिए हैं, ऐसा मालूम होकर इनसे पृथक (किसी तरह से सम्बन्ध न रखनेवाला) आत्मा का ज्ञान होता है, सारांश ज्ञान प्राप्त होने का क्रम ऐसा ही होने के कारण यहाँ भी व्यक्त, अव्यक्त, ज्ञ ऐसा क्रम से ही कहा गया है ।

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