Sunday, July 27, 2014

कटपयादि:

संख्याओं को शब्द या श्लोक के रूप में आसानी से याद रखने की प्राचीन भारतीय पद्धति |

शंकरवर्मन द्वारा रचित सद्रत्नमाला का निम्नलिखित श्लोक इस पद्धति को स्पष्ट करता है -

नज्ञावचश्च शून्यानि संख्या: कटपयादय:|
मिश्रे तूपान्त्यहल् संख्या न च चिन्त्यो हलस्वर:||


Transiliteration:

nanyāvacaśca śūnyāni saṃkhyāḥ kaṭapayādayaḥ
miśre tūpāntyahal saṃkhyā na ca cintyo halasvaraḥ

अर्थ: न, ञ तथा अ शून्य को निरूपित करते हैं। (स्वरों का मान शून्य है) शेष नौ अंक क, ट, प और य से आरम्भ होने वाले व्यंजन वर्णों द्वारा निरूपित होते हैं। किसी संयुक्त व्यंजन में केवल बाद वाला व्यंजन ही लिया जायेगा। बिना स्वर का व्यंजन छोड़ दिया जायेगा।

उदाहरण:

1). सदरत्नमाला में पाई का मान

गोपीभाग्यमध्रुवात श्रृङ्गिशोदधिसन्धिग ।
खलजीवितखाताव गलहालारसंधर ।।
= 314159265358979324 (सत्रह दशमलव स्थानों तक, 3 के बाद दशमलव मानिए।)
2). कुछ लोग बच्चों के नाम उनके जन्मकाल के आधार पर कटपयादि का उपयोग करते हुए रखते हैं।



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