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चर्पट - पुराना फटा कपडा/Tattered piece of cloth
पञ्जरिका - पिंजड़ा/Cage
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भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् गोविन्दम् भज मूढ़मते।
संप्राप्ते सन्निहिते मरणे न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
संप्राप्त - अर्जित/attained
सन्निहिते - पास में/situated nearby
रे मूढ़ मन... गोविन्द की खोज कर, गोविन्द का भजन कर और गोविन्द का ही ध्यान कर... अन्तिम समय आने पर व्याकरण के नियम तेरी रक्षा न कर सकेंगे...
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दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्चत्याशावायुः॥1॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
निशिदिन शाम सवेरा आता, फेरा शिशिर वसंत लगाता।
काल खेल में जाता जीवन, कटता किंतु न आशा बंधन॥1॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः रात्रौ चिबुकसमर्पितजानुः।
करतलभिक्षा तरुतलवासः तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥2॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
अग्नि-सूर्य से तप दिन जाते, घुटने मोड़े रात बिताते।
बसे वृक्ष तल, लिए भीख धन, किंतु न छूटा आशा बंधन॥2॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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यावद्वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारोरक्तः।
पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वार्ता पृच्छति कोऽपि न गेहे॥3॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
जब तक कमा-कमा धन धरता, प्रेम कुटुंब तभी तक करता।
जब होगा तन बूढ़ा जर्जर, कोई बात न पूछेगा घर॥3॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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जटिलो मुण्डी लुञ्चितकेशः काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति लोकः उदरनिमित्तं बहुकृतशोकः॥4॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
जटा बढ़ाई, मूंड मुंडाए, नोचे बाल, वस्त्र रंगवाये।
सब कुछ देख, न देख सका जन, करता शोक पेट के कारण॥4॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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भगवद् गीता किञ्चितधीता गङ्गाजल लवकणिका पीता।
सकृदपि यस्य मुरारिसमर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चा॥5॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
पढ़ी तनिक भी भगवद् गीता, एक बूंद गंगाजल पीता।
प्रेम सहित हरि पूजन करता, यम उसकी चर्चा से डरता॥5॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।
वृध्दो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥6॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
गलितं -- worn out
पलितं - grey with age
तुण्डं - mouth
मुञ्चति - leaves
The body has become worn out. The head has turned grey. The mouth has become toothless.
The old man moves about leaning on his staff. Even then he leaves not the bundle of his desires.
सारे अंग शिथिल, सिर मुंडा, टूटे दांत, हुआ मुख तुंडा।
वृद्ध हुए तब दंड उठाया, किंतु न छूटी आशा-माया॥6॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः।
वृध्दस्तावच्चिन्तामग्नः परे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः॥7॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
बालकपन हंस-खेल गंवाया, यौवन तरुणी संग बिताया।
वृद्ध हुआ चिंता ने घेरा, पार ब्रह्म में ध्यान न तेरा॥7॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे खलु दुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे॥8॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
फिर-फिर जनम-मरण है होता, मातृ उदर में फिर-फिर सोता।
दुस्तर भारी संसृति सागर, करो मुरारे पार कृपा कर॥8॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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पुनरपि रजनी पुनरपि दिवसः पुनरपि पक्षः पुनरपि मासः।
पुनरप्ययनं पुनरपि वर्षम् तदपि न मुञ्चत्याशामर्षम्॥9॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
फिर-फिर रैन-दिवस हैं आते, पक्ष-महीने आते-जाते।
अयन, वर्ष होते नित नूतन, किंतु न छूटा आशा बंधन॥9॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः।
नष्टे द्रव्ये कः परिवारः ज्ञाते तत्वे कः संसारः॥10॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
काम वेग क्या आयु ढले पर, नीर सूखने पर क्या सरवर।
क्या परिवार द्रव्य खोने पर, क्या संसार ज्ञान होने पर॥10॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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नारीस्तनभरनाभिनिवेशं मिथ्यामायामोहावेशम्।
एतन्मांसवसादि विकारं मनसि विचारय बारम्बारम्॥11॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
नारि नाभि कुच में रम जाना, मिथ्या माया मोह जगाना।
मैला मांस विकार भरा घर, बारम्बार विचार अरे नर॥11॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः।
इति परभावय सर्वमसारम् विश्वं त्यक्ता स्वप्नविचारम्॥12॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
तू मैं कौन, कहां से आए, कौन पिता मां किसने जाये।
इनको नित्य विचार अरे नर, जग प्रपंच तज स्वप्न समझकर॥12॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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गेयं गीतानामसह्स्रम् ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम्।
नेयं सज्जनसङ्गे चित्तम् देयं दीनजनाय च वित्तम्॥13॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
गीता ज्ञान विचार निरंतर, सहस नाम जप हरि में मन धर।
सत्संगति में बैठ ध्यान दे, दीनजनों को द्रव्य दान दे॥13॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे।
गतवति वायौ देहापाये भार्या विभ्यति तस्मिन्काये॥14॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
जब तक रहते प्राण देह में, तब तक पूछें कुशल गेह में।
तन से सांस निकल जब जाते, पत्नी-पुत्र सभी भय खाते॥14॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।
यद्यपि लोके मरणं शरणम् तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥15॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
भोग-विलास किए सब सुख से, फिर तन होता रोगी दुःख से।
मरना निश्चित जग में जन को, किंतु न तजता पाप चलन को॥15॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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रथ्याचर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः।
नाहं न त्वं नायं लोकः तदपि किमर्थं क्रियते शोकः॥16॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
चिथड़ों की गुदड़ी बनवा ली, पुण्य-पाप से राह निराली।
नित्य नहीं मैं, तू जग सारा, फिर क्यों करता शोक पसारा॥16॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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कुरुते गङ्गासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहीने सर्वमतेन मुक्तिर्भवति न जन्मशतेन॥17॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
क्या गंगासागर का जाना, धर्म-दान-व्रत-नियम निभाना।
ज्ञान बिना चाहे कुछ भी कर, सौ-सौ जन्म न मुक्ति मिले नर॥17॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
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--- श्री शञ्कराचार्यविरचितम्
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Small details about sanskrit that makes big difference when speaking or writing the language
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Sunday, October 5, 2014
Sunday, July 27, 2014
श्लोक
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण: ।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥
सप्तचिरञ्जीविनां नामानि -
• अश्वत्थामा
• बलिः
• व्यासः
• हनूमान्
• विभीषणः
• कृपः
• परशुरामः
ये सात चिरंजीवी(हमेशा जीवित रहने वाले) हैं - अश्वत्थामा, बाली, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृप, परशुराम |
These are the seven immortals - Ashwatthama, Bali, Ved Vyas, Vibhishan, Krip, Parshu Ram.
सत्यम ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम अप्रियम् |
प्रियम् च नानृताम्ब्रुयात्, एष: धर्म सनातनः ||
सत्य बोलो , प्रिय बोलो | अप्रिय मत बोलो, अगर वह सत्य हो तो भी |
प्रिय और सत्य बोलना ही सनातन धर्म है |
Always speak the truth and that which will please others;
even if it is the truth, do not utter if it is unpleasant to others.
To speak what pleases others and the truth, is the Sanatan Dharma.
नास्ति विद्या समं चक्षू नास्ति सत्य समं तप: |
नास्ति राग समं दु:खम् नास्ति त्याग समं सुखम् ||
विद्या के बराबर आँखें नहीं, सत्य के बराबर कोई तप नहीं |
किसी से द्वेष के बराबर कोई दुःख नहीं और त्याग जैसा कोई सुख नहीं ||
No eyes can compete with knowledge,
no hard work is equal to speaking truth,
no hate is equal to sadness and
no happiness is greater than sacrifice.
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥
सप्तचिरञ्जीविनां नामानि -
• अश्वत्थामा
• बलिः
• व्यासः
• हनूमान्
• विभीषणः
• कृपः
• परशुरामः
ये सात चिरंजीवी(हमेशा जीवित रहने वाले) हैं - अश्वत्थामा, बाली, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृप, परशुराम |
These are the seven immortals - Ashwatthama, Bali, Ved Vyas, Vibhishan, Krip, Parshu Ram.
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काक चेष्टा बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च ।
अल्पहारी गृह त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥
एक विद्यार्थी को कौव्वे की तरह जानने की चेष्टा करते रहना चाहिए, बगुले की तरह मन लगाना(ध्यान करना) चाहिए, कुत्ते की तरह सोना चाहिए, काम से काम और आवश्यकतानुसार खाना चाहिए और गृह-त्यागी होना चाहिए |
यही पांच लक्षण एक विद्यार्थी के होते है |
A student should be alert like a crow, have concentration like that of a Crane and sleep like that of a dog that wakes up even at slightest of the noise. The student should eat scantily to suffice his energy needs and neither less not more. Also he should stay away from chores of daily house hold stuff and emotional attachment.
अल्पहारी गृह त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥
एक विद्यार्थी को कौव्वे की तरह जानने की चेष्टा करते रहना चाहिए, बगुले की तरह मन लगाना(ध्यान करना) चाहिए, कुत्ते की तरह सोना चाहिए, काम से काम और आवश्यकतानुसार खाना चाहिए और गृह-त्यागी होना चाहिए |
यही पांच लक्षण एक विद्यार्थी के होते है |
A student should be alert like a crow, have concentration like that of a Crane and sleep like that of a dog that wakes up even at slightest of the noise. The student should eat scantily to suffice his energy needs and neither less not more. Also he should stay away from chores of daily house hold stuff and emotional attachment.
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गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिंतयेत्।
वर्तमानेन कालेन वर्तयंति विचक्षणाः॥
जो बीत चुका उसकी चिंता करना बेकार है | जो आने वाला है उसकी भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है | बुद्धिमान वे है जो वर्त्तमान में जीते हैं |
The clearheaded, wise, focus on the present. they don't mourn for the past that has gone. they don't worry for the future that is not yet come.
वर्तमानेन कालेन वर्तयंति विचक्षणाः॥
जो बीत चुका उसकी चिंता करना बेकार है | जो आने वाला है उसकी भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है | बुद्धिमान वे है जो वर्त्तमान में जीते हैं |
The clearheaded, wise, focus on the present. they don't mourn for the past that has gone. they don't worry for the future that is not yet come.
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उद्यमेन हि सिद्धन्ति कार्याणि ना मनोरथै ।
न हि सुप्तस्य सिंघस्य प्रविशति मुखे मृगाः।।
जिस तरह सोते शेर में मुह में हिरन नहीं आता, पेट भरने की लिए उसे शिकार करना पड़ता हैं, उसी तरह, मेहनत(प्रयत्न) करने से ही कार्य सिद्ध होते हैं सिर्फ सोचने से नहीं |
न हि सुप्तस्य सिंघस्य प्रविशति मुखे मृगाः।।
जिस तरह सोते शेर में मुह में हिरन नहीं आता, पेट भरने की लिए उसे शिकार करना पड़ता हैं, उसी तरह, मेहनत(प्रयत्न) करने से ही कार्य सिद्ध होते हैं सिर्फ सोचने से नहीं |
Work gets accomplished by putting in effort, and certainly not by mere
wishful thinking. Deer certainly do not enter a sleeping lion’s mouth.
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सत्यम ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम अप्रियम् |
प्रियम् च नानृताम्ब्रुयात्, एष: धर्म सनातनः ||
सत्य बोलो , प्रिय बोलो | अप्रिय मत बोलो, अगर वह सत्य हो तो भी |
प्रिय और सत्य बोलना ही सनातन धर्म है |
Always speak the truth and that which will please others;
even if it is the truth, do not utter if it is unpleasant to others.
To speak what pleases others and the truth, is the Sanatan Dharma.
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नास्ति विद्या समं चक्षू नास्ति सत्य समं तप: |
नास्ति राग समं दु:खम् नास्ति त्याग समं सुखम् ||
विद्या के बराबर आँखें नहीं, सत्य के बराबर कोई तप नहीं |
किसी से द्वेष के बराबर कोई दुःख नहीं और त्याग जैसा कोई सुख नहीं ||
No eyes can compete with knowledge,
no hard work is equal to speaking truth,
no hate is equal to sadness and
no happiness is greater than sacrifice.
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काक चेष्टा बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च ।
अल्पहारी गृह त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥
एक विद्यार्थी को कौव्वे की तरह जानने की चेष्टा करते रहना चाहिए, बगुले की तरह मन लगाना(ध्यान करना) चाहिए, कुत्ते की तरह सोना चाहिए, काम से काम और आवश्यकतानुसार खाना चाहिए और गृह-त्यागी होना चाहिए |
यही पांच लक्षण एक विद्यार्थी के होते है |
A student should be alert like a crow, have concentration like that of a Crane and sleep like that of a dog that wakes up even at slightest of the noise. The student should eat scantily to suffice his energy needs and neither less not more. Also he should stay away from chores of daily house hold stuff and emotional attachment.
ॐ असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।।
मृत्योर्मामृतं गमय ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
-बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28.
हिंदी
-----
मैं असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर जाऊँ,
मैं अन्धकार की तरफ नहीं, रौशनी की तरफ जाऊँ,
मैं मृत्यु को नहीं, अमृत को पाऊँ |
English
----------
Lead me not to unreal but real,
Lead me not to darkness but light,
Lead me not to death but immortality.
sandhi
---------
सद्गमय -> सत + गमय - go to truth
ज्योतिर्गमय -> ज्योति + गमय - go to light
मृत्योर्मामृतं -> मृत्यु + मा + अमृतम् - not death but immortality
word meaning
------------------
असत - Unreal
मा - do not
तमस - Darkness
Pronunciation:
------------------
oṁ asato mā sad gamaya
tamaso mā jyotir gamaya
mṛtyor mā amṛtaṁ gamaya
oṁ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ
अल्पहारी गृह त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥
एक विद्यार्थी को कौव्वे की तरह जानने की चेष्टा करते रहना चाहिए, बगुले की तरह मन लगाना(ध्यान करना) चाहिए, कुत्ते की तरह सोना चाहिए, काम से काम और आवश्यकतानुसार खाना चाहिए और गृह-त्यागी होना चाहिए |
यही पांच लक्षण एक विद्यार्थी के होते है |
A student should be alert like a crow, have concentration like that of a Crane and sleep like that of a dog that wakes up even at slightest of the noise. The student should eat scantily to suffice his energy needs and neither less not more. Also he should stay away from chores of daily house hold stuff and emotional attachment.
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ॐ असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।।
मृत्योर्मामृतं गमय ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
-बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28.
हिंदी
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मैं असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर जाऊँ,
मैं अन्धकार की तरफ नहीं, रौशनी की तरफ जाऊँ,
मैं मृत्यु को नहीं, अमृत को पाऊँ |
English
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Lead me not to unreal but real,
Lead me not to darkness but light,
Lead me not to death but immortality.
sandhi
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सद्गमय -> सत + गमय - go to truth
ज्योतिर्गमय -> ज्योति + गमय - go to light
मृत्योर्मामृतं -> मृत्यु + मा + अमृतम् - not death but immortality
word meaning
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असत - Unreal
मा - do not
तमस - Darkness
Pronunciation:
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oṁ asato mā sad gamaya
tamaso mā jyotir gamaya
mṛtyor mā amṛtaṁ gamaya
oṁ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ
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'मनः शौचं, कर्म शौचं, कुल शौचं च भारत;
शरीर शौचं, वाक् शौचं, शौचं पञ्च विधः स्मृतम्'।
शरीर शौचं, वाक् शौचं, शौचं पञ्च विधः स्मृतम्'।
धर्म लक्षणों में पांचवाँ लक्षण शौच(शुचि) अर्थात पवित्रता है १. मन की पवित्रता,२. कार्य की पवित्रता, ३. कुल की पवित्रता, ४. शरीर की पवित्रता और ५. वाणी की पवित्रता, अर्थात जो इन पांचो दृष्टियों से पवित्र है उसी को वास्तविकता में पवित्र माना जा सकता है |
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