Showing posts with label stotra. Show all posts
Showing posts with label stotra. Show all posts

Wednesday, October 3, 2018

श्रीहरिनाममालास्तोत्रम्







गोविन्दं गोकुलानन्दम् गोपालम् गोपिवल्लभम् ।

गोवर्द्धनोद्धरम् धीरम् तम् वन्दे गोमतीप्रियम् ॥ १ ॥



नारायणम् निराकारम् नरवीरम् नरोत्तमम् ।

नृसिंहम् नागनाथम् च तम् वन्दे नरकांत्तकम् ॥ २ ॥



पीतांबरम् पद्मनाभम् पद्माक्षम् पुरुषोत्तमम् ।

पवित्रम् परमानन्दम् तम् वन्दे परमेश्वरम् ॥ ३ ॥



राघवम् रामचन्द्रम् च रावणारिम् रमापतिम् ।

राजीवलोचनम् रामम् तम् वन्दे रघुनन्दनम् ॥ ४ ॥



वामनम् विश्वरूपम् च वासुदेवम् च विठ्ठलम् ।

विश्वेश्वरम् विभुम् व्यासम् तम् वन्दे वेदवल्लभम् ॥ ५ ॥



दामोदरम् दिव्यसिंहम् दयालुम् दीननायकम् ।

दैत्यारिम् देवदेवेशम् तम् वन्दे देवकी-सुतम् ॥ ६ ॥



मुरारिम् माधवम् मत्स्यम् मुकुन्दम्  मुष्टिमर्दनम् ।

मुञ्जकेशम् महाबाहुम् तम् वन्दे मधुसूदनम् ॥ ७ ॥



केशवम् कमलाकान्तम् कामेशम् कौस्तुभप्रियम् ।

कौमोदकीधरम् कृष्णम् तम् वन्दे कौरवान्तकम् ॥ ८ ॥



भूधरम् भुवनानन्दम् भूतेशम् भूतनायकम् ।

भावनैकम् भुजंगेशम् तम् वन्दे भवनाशनम् ॥ ९ ॥



जनार्दनम् जगन्नाथम् जगज्जड्यविनाशकम् ।

जामदग्न्यम् वरम् ज्योति: तम् वन्दे जलशायिनम् ॥ १० ॥



चतुर्भुजम् चिदानन्दम् चाणुरमल्लमर्दनम् ।

चराचरगतम् देवम् तम् वन्दे चक्रपाणिनम् ॥ ११ ॥



श्रिय: करम् श्रियो नाथम् श्रीधरम् श्रीवरप्रदम् ।

श्रीवत्सलधरम् सौम्यं तम् वन्दे श्रीसुरेश्वरम् ॥ १२ ॥



योगीश्वरम् यज्ञपतिम् यशोदानन्ददायकम् ।

यमुनाजलकल्लोलम् तम् वन्दे यदुनायकम् ॥ १३ ॥



शालिग्रामम् शिलाशुद्धम् शंखचक्रोपशोभितम् ।

सुरासुरैस्सदा सेव्यम् तम् वन्दे साधुवल्लभम् ॥ १४ ॥



त्रिविक्रमम् तपोमूर्तिम् त्रिविधाघौघनाशनम् ।

त्रिस्थलम् तीर्थराजेन्द्रम् तम् वन्दे तुलसीप्रियम् ॥ १५ ॥



अनन्तम् आदिपुरुषम् अच्युतम् च वरप्रदम् ।

आनन्दम् च सदानन्दम् तम् वन्दे च अघनाशनम् ॥ १६ ॥



लीलयोद्‌धृतभूभारम् लोकसत्त्वैकवंदितम् ।

लोकेश्वरम् च श्रीकांतम् तम् वन्दे लक्ष्मणप्रियम् ॥ १७ ॥



हरिम् च हरिणाक्षम् च हरिनाथम् हरिप्रियम् ।

हलायुधसहायम् च तम् वन्दे हनुमत्पतिम् ॥ १८ ॥



हरिनामकृता माला पवित्रा पापनाशिनी ।

बलिराजेंद्रेण चोक्ता कण्ठे धार्या प्रयत्नत: ॥ १९ ॥



इति बलिराजेन्द्रेणोक्तम् हरिनाममालास्तोत्रम् संपूर्णम्

Friday, September 14, 2018

श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्रम्





करारविन्देन पदार्विन्दं मुखार्विन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि।।


जिन्होंने अपने करकमल से चरणकमल को पकड़ कर उसके अंगूठे को अपने मुखकमल में डाल रखा है और जो वटवृक्ष के एक पर्णपुट (पत्ते के दोने) पर शयन कर रहे हैं, ऐसे बाल मुकुन्द का मैं मन से स्मरण करता हूँ।

श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्रम्

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।
जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।


हे जिह्वे ! तू ‘श्रीकृष्ण ! गोविन्द ! हरे ! मुरारि ! हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव ! तथा गोविन्द ! दामोदर ! माधव !’–इस नामामृत का ही निरन्तर प्रेमपूर्वक पान करती रह।

विक्रेतुकामाकिलगोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्ति:।
दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति।।

जिनकी चित्तवृत्ति मुरारि के चरणकमलों में लगी हुई है, वे सभी गोपकन्याएं दूध-दही बेचने की इच्छा से घर से चलीं। उनका मन तो मुरारि के पास था; अत: प्रेमवश सुध-बुध भूल जाने के कारण ‘दही लो दही’ इसके स्थान पर जोर-जोर से ‘गोविन्द ! दामोदर ! माधव !’ आदि पुकारने लगीं।

गृहे गृहे गोपवधूकदम्बा: सर्वे मिलित्वा समवाप्य योगम्।
पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।

व्रज के प्रत्येक घर में गोपांगनाएं एकत्र होने का अवसर पाने पर झुंड-की-झुंड आपस में मिलकर उन मनमोहन माधव के ‘गोविन्द, दामोदर, माधव’ इन पवित्र नामों को नित्य पढ़ा करती हैं।

जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि।
समस्त भक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति।।


हे जिह्वे ! तू सदा ही श्रीकृष्णचन्द्र के ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन मनोहर मंजुल नामों को, जो भक्तों के समस्त संकटों की निवृत्ति करने वाले हैं, भजती रह।

सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णो: प्रवदन्ति मर्त्या:।
ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति।।

अपने घर में ही सुख से शय्या पर शयन करते हुए भी जो लोग ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन विष्णुभगवान के पवित्र नामों को निरन्तर कहते रहते हैं, वे निश्चय ही भगवान की तन्मयता प्राप्त कर लेते हैं।

सुखावसाने इदमेव सारं दु:खावसाने इदमेव ज्ञेयम्।
देहावसाने इदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।

सुख के अंत में यही सार है, दु:ख के अंत में यही गाने योग्य है और शरीर का अंत होने के समय भी यही मन्त्र जपने योग्य है, कौन-सा मन्त्र? यही कि ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’


श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धननाथ विष्णो।
जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।


हे जिह्वे ! तू ‘श्रीकृष्ण ! राधारमण ! व्रजराज ! गोपाल ! गोवर्धन ! नाथ ! विष्णो ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव !’–इस नामामृत का निरन्तर पान करती रह।

त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति।।


हे जिह्वे! मैं तुझी से एक भिक्षा मांगता हूँ, तू ही मुझे दे। वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीर का अन्त करने आवें तो बड़े ही प्रेम से गद्गद् स्वर में ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन मंजुल नामों का उच्चारण करती रहना।

जिह्वे रसज्ञे मधुर प्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि।
आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति।।


हे रसों को चखने वाली जिह्वे ! तुझे मीठी चीज बहुत अधिक प्यारी लगती है, इसलिए मैं तेरे हित की एक बहुत ही सुन्दर और सच्ची बात बताता हूँ। तू निरन्तर ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन मधुर मंजुल नामों की आवृत्ति किया कर।

अग्रे कुरूणाम् अथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृत-वस्त्र-केशा ।           
कृष्णा तदाक्रोशत् अनन्यनाथागोविन्द दामोदर माधवेति  ।।

जिस समय कौरव और पांडवो के सामने भरी हुई सभा मैं दुशासन ने द्रौपदी के वस्त्र और बालों को पकड़कर खींचा , तब उस समय उसका ( द्रौपदी ) का कोई दूसरा नाथ नहीं है ऐसी द्रौपदी ने रोकर  पुकारा - हे गोविन्द, हे दामोदर, हे माधव .

कृष्ण विष्णो मधु-कैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे ।
त्रायस्व मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति  ।।

हे कृष्ण, हे विष्णु , हे मधुकेटभ को मारने वाले , हे भगतों पर अनुकम्पा करने वाले , हे भगवान , हे मुरारी , हे केशव , हे लोकेश्वर , हे गोविन्द , हे दामोदर , हे माधव , मेरी रक्षा करो , रक्षा करो

उलूखले सम्भृत-तन्डुलांश्च सैघट्टयन्त्यो मुसलैः प्रमुग्धाः ।             
गायन्ति गोप्यो जनितानुरागा गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

ओखली मे धान भरे हुए हैं । उन्हें गोप - रमणियाँ मूसलों से कूट रही हैं । और कूटते कूटते कृष्ण प्रेम मे विभोर होकर , गोविन्द , दामोदर, माधव .इस प्रकार गायन करती जाती हैं ।

काचित् कराम्भोज-पुटे निषण्णं क्रीडा-शुकं किंशुक-रक्त-तुण्डम् ।             
अध्यापयामास सरोरुहाक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति  ।।

कोई कमलनयनी मनोविनोद के लिये पाले हुए अपने कर कमल पर बैठे किंशुककुसुम ( पलाश के पौधे ) के समान रक्तवर्ण चोंच वाले सुग्गे ( तोता )को पड़ा रही थी । पड़ो तो तोता गोविन्द , दामोदर, माधव कहने लगा .

पर्य्यण्किकाभाजम् अलम् कुमारं प्रस्वापयन्त्योऽखिल-गोप-कन्याः ।        
जगुः प्रबन्धं स्वर-ताल-बन्धं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

पालने मे पौड़े हुए अपने नन्हें बच्चे को सुलाती हुई सभी गोपकन्याएँ ताल स्वर के साथ गोविन्द , दामोदर , माधव, इस पद को गाती जाती थी ।

रामानुजं वीक्षण-केलि-लोलं गोपि गृहीत्वा नव-नीत-गोलम् ।
आबालकं बालकम् आजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति  ।।

हाथों मे माखन का गोला लेकर मैया जशोदा ने आँखमिछोनी क्रीड़ा मे व्यस्त बलराम के छोटे भाई कृष्ण को बालकों के बीच में से पकड़ कर पुकारा अरे गोविन्द , अरे दामोदर , अरे माधव ।

विचित्र-वर्णाभरणाभिरामेऽभिधेहिऽवक्त्राम्बुज-राजहंसे ।      
सदा मदीये रसनेऽग्र-रङ्गे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

विचित्र वर्णमय आभरणों से अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होने वाली है. मुखकमल की राजहंसीरूपिणी मेरी रसने तू सर्वप्रथम गोविन्द , दामोदर , माधव इस ध्वनी का ही विस्तार कर ।

अङ्काधिरूढं शिशु-गोप-गूढं स्तनं धयन्तं कमलैक-कान्तम् ।         
सम्बोधयामास मुदा यशोदा गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

अपनी गोद मैं बैठकर दूध पीते हुए बालगोपाल रूपधारी भगवान लक्ष्मीकान्त को लक्ष्य करके प्रेमानन्द मे मगन हुई जशोदा मैया इस प्रकार बुलाती करती थी . ऐ मेरे गोविन्द , ऐ गोविन्द , ऐ माधव ज़रा बोलो तो सही ।

क्रीडन्तम् अन्तर्-व्रजम् आत्मनं स्वं समं वयस्यैः पशु-पाल-बालैः ।              
प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

अपने सामवयस्क गोपबालकौं के साथ गौष्ठ में खेलते हुए अपने पुत्र कृष्ण यशोदा मैया ने अत्यंत स्नेह के साथ पुकारा . हे गोविन्द , हे मुरारी , हे माधव ( कहाँ चला गया ).

यशोदया गाढम् उलूखलेन गो-कण्ठ-पाशेन निबध्यमानम् ।  
रुरोद मन्दं नवनीत-भोजी गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

अधिक चपलता करने के कारण मैया ने गौ बाँधने वाली रस्सी से ख़ूब कसकर ओखली में उन घनश्याम को बॉध दिया . तब तो वे माखन भोगी कृष्ण धीरे धीरे ( आँखे मलते हुए ) सिसक सिसककर गोविन्द, दामोदर , माधव कहते हुए रोने लगे

निजाङ्गणे कङ्कण-केलि-लोलं गोपी गृहीत्वा नवनीत-गोलम् ।           
आमर्दयत् पाणि-तलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

श्री नन्दनंदन अपने ही घर के आँगन मे अपने हाथ के    कंक्ण ( कंगन ) से खेलने में लगे हुए है . उसी समय मैया ने धीरे से जाकर उनके कमलनयनों को जाकर अपनी हथेली से मूँद तथा दूसरे हाथ में नवनीत का गोल लेकर प्रेम पूर्वक कहने लगी गोविन्द , दामोदर , माधव ( लो देखो माखन खा लो )

मन्दार-माले वदनाभिरामं बिम्बाधरे पूरित-वेणु-नादम्।             
गो-गोप-गोपी जन-मध्य-संस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

जिनका मुखारबिंद बड़ा ही मनोहर हे । जी अपने बिम्ब के समान अरूण अधरों पर रखकर वंशी की मधुर धुन कर रहे हैं तथा जो कदम्ब के तले गौ, गोप  और गोपियों के मध्य में विराजमान । उन भगवन का हे गोविन्द , हे दामोदर , हे माधव इस प्रकार कहते हुए सदा स्मरण करना चाहिये 

उत्थाय गोप्योऽपर-रात्र-भोगे स्मृत्वा यशोदा-सुत-बाल-केलिम् ।               
गायन्ति प्रोच्चैः दधि-मन्थयन्त्यो गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

व्रजाड्गनाएँ ब्राह्ममुहूर्त मे उठकर और उन यशुमतीनन्दन की बाल क्रीड़ाओं की बातों को 
याद करके दही मथते मथते गोविन्द , दामोदर, माधव । इन पदों को उच्च स्वर से गाया करती है

जग्धोऽथ दत्तो नवनीत-पिण्डो गृहे यशोदा विचिकित्सयन्ती ।           
उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

दधि मथकर माता ने माखन का लौदाँ रख दिया था। माखन भोगी क्रष्ण की दृष्टि पड़ गयी , झट से उठा लाये . कुछ खाया कुछ बाँट दिया । जब ढूँढते ढूँढते नहीं मिला तो यशोदा मैया ने आप (कृष्ण) पर संदेह करते हुए पूछा हे मुरारी, हे गोविन्द , हे माधव सही सही बता माखन के लौंदा का क्या हुआ

अभ्यर्च्य गेहं युवतिः प्रवृद्ध-प्रेम-प्रवाहा दधि निर्ममन्थ ।             
गायन्ति गोप्योऽथ सखी-समेता गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

जिसके ह्रदय मैं प्रेम की बाड़ आ रही है , ऐसी माता 
यशोदा घर को लीपकर दही को मथने लगी । तब और सब गोपांगनाए तथा सखियाँ मिलकर गोविन्द , दामोदर , माधव , इस पद का गान करने लगीं

क्वचित् प्रभाते दधि-पूर्ण-पात्रे निक्षिप्य मन्थं युवती मुकुन्दम् ।
आलोक्य गानं विविधं करोति गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

किसी दिन प्रातः काल ज्यों ही माता यशोदा दही भरे भांडे मे मथानी को छोड़कर उठी त्यों ही उसकी 
दृष्टि शैया पर बैठे हुए मनमोहन मुकुंद पर पड़ी । सरकार को देखते ही वह प्रेम से पगली हो गयी । और मेरा गोविन्द , मेरा माधव , मेरा मुरारी ऐसा कहकर तरह तरह से गाने लगी.



Sunday, October 5, 2014

चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्

====================

चर्पट - पुराना फटा कपडा/Tattered piece of cloth
पञ्जरिका - पिंजड़ा/Cage

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् गोविन्दम् भज मूढ़मते।
संप्राप्ते सन्निहिते मरणे न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

संप्राप्त - अर्जित/attained
सन्निहिते - पास में/situated nearby

रे मूढ़ मन... गोविन्द की खोज कर, गोविन्द का भजन कर और गोविन्द का ही ध्यान कर... अन्तिम समय आने पर व्याकरण के नियम तेरी रक्षा न कर सकेंगे...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्चत्याशावायुः॥1॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

निशिदिन शाम सवेरा आता, फेरा शिशिर वसंत लगाता।
काल खेल में जाता जीवन, कटता किंतु न आशा बंधन॥1॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः रात्रौ चिबुकसमर्पितजानुः।
करतलभिक्षा तरुतलवासः तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥2॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

अग्नि-सूर्य से तप दिन जाते, घुटने मोड़े रात बिताते।
बसे वृक्ष तल, लिए भीख धन, किंतु न छूटा आशा बंधन॥2॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
यावद्वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारोरक्तः।
पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वार्ता पृच्छति कोऽपि न गेहे॥3॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

जब तक कमा-कमा धन धरता, प्रेम कुटुंब तभी तक करता।
जब होगा तन बूढ़ा जर्जर, कोई बात न पूछेगा घर॥3॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जटिलो मुण्डी लुञ्चितकेशः काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति लोकः उदरनिमित्तं बहुकृतशोकः॥4॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

जटा बढ़ाई, मूंड मुंडाए, नोचे बाल, वस्त्र रंगवाये।
सब कुछ देख, न देख सका जन, करता शोक पेट के कारण॥4॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
भगवद् गीता किञ्चितधीता गङ्गाजल लवकणिका पीता।
सकृदपि यस्य मुरारिसमर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चा॥5॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

पढ़ी तनिक भी भगवद् गीता, एक बूंद गंगाजल पीता।
प्रेम सहित हरि पूजन करता, यम उसकी चर्चा से डरता॥5॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।
वृध्दो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥6॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

गलितं -- worn out
पलितं - grey with age
तुण्डं - mouth
मुञ्चति - leaves

The body has become worn out. The head has turned grey. The mouth has become toothless.
The old man moves about leaning on his staff. Even then he leaves not the bundle of his desires.

सारे अंग शिथिल, सिर मुंडा, टूटे दांत, हुआ मुख तुंडा।
वृद्ध हुए तब दंड उठाया, किंतु न छूटी आशा-माया॥6॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः।
वृध्दस्तावच्चिन्तामग्नः परे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः॥7॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

बालकपन हंस-खेल गंवाया, यौवन तरुणी संग बिताया।
वृद्ध हुआ चिंता ने घेरा, पार ब्रह्म में ध्यान न तेरा॥7॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे खलु दुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे॥8॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

फिर-फिर जनम-मरण है होता, मातृ उदर में फिर-फिर सोता।
दुस्तर भारी संसृति सागर, करो मुरारे पार कृपा कर॥8॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पुनरपि रजनी पुनरपि दिवसः पुनरपि पक्षः पुनरपि मासः।
पुनरप्ययनं पुनरपि वर्षम् तदपि न मुञ्चत्याशामर्षम्॥9॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

फिर-फिर रैन-दिवस हैं आते, पक्ष-महीने आते-जाते।
अयन, वर्ष होते नित नूतन, किंतु न छूटा आशा बंधन॥9॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः।
नष्टे द्रव्ये कः परिवारः ज्ञाते तत्वे कः संसारः॥10॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

काम वेग क्या आयु ढले पर, नीर सूखने पर क्या सरवर।
क्या परिवार द्रव्य खोने पर, क्या संसार ज्ञान होने पर॥10॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
नारीस्तनभरनाभिनिवेशं मिथ्यामायामोहावेशम्।
एतन्मांसवसादि विकारं मनसि विचारय बारम्बारम्॥11॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

नारि नाभि कुच में रम जाना, मिथ्या माया मोह जगाना।
मैला मांस विकार भरा घर, बारम्बार विचार अरे नर॥11॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः।
इति परभावय सर्वमसारम् विश्वं त्यक्ता स्वप्नविचारम्॥12॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

तू मैं कौन, कहां से आए, कौन पिता मां किसने जाये।
इनको नित्य विचार अरे नर, जग प्रपंच तज स्वप्न समझकर॥12॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
गेयं ग‍ीतानामसह्स्रम् ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम्।
नेयं सज्जनसङ्गे चित्तम् देयं दीनजनाय च वित्तम्॥13॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

गीता ज्ञान विचार निरंतर, सहस नाम जप हरि में मन धर।
सत्संगति में बैठ ध्यान दे, दीनजनों को द्रव्य दान दे॥13॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे।
गतवति वायौ देहापाये भार्या विभ्यति तस्मिन्काये॥14॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

जब तक रहते प्राण देह में, तब तक पूछें कुशल गेह में।
तन से सांस निकल जब जाते, पत्नी-पुत्र सभी भय खाते॥14॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।
यद्यपि लोके मरणं शरणम् तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥15॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

भोग-विलास किए सब सुख से, फिर तन होता रोगी दुःख से।
मरना निश्चित जग में जन को, किंतु न तजता पाप चलन को॥15॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
रथ्याचर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः।
नाहं न त्वं नायं लोकः तदपि किमर्थं क्रियते शोकः॥16॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

चिथड़ों की गुदड़ी बनवा ली, पुण्य-पाप से राह निराली।
नित्य नहीं मैं, तू जग सारा, फिर क्यों करता शोक पसारा॥16॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कुरुते गङ्गासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहीने सर्वमतेन मुक्तिर्भवति न जन्मशतेन॥17॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

क्या गंगासागर का जाना, धर्म-दान-व्रत-नियम निभाना।
ज्ञान बिना चाहे कुछ भी कर, सौ-सौ जन्म न मुक्ति मिले नर॥17॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
--- श्री शञ्कराचार्यविरचितम्
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~