Small details about sanskrit that makes big difference when speaking or writing the language
Showing posts with label stotram. Show all posts
Showing posts with label stotram. Show all posts
Wednesday, October 3, 2018
श्रीहरिनाममालास्तोत्रम्
गोविन्दं गोकुलानन्दम् गोपालम् गोपिवल्लभम् ।
गोवर्द्धनोद्धरम् धीरम् तम् वन्दे गोमतीप्रियम् ॥ १ ॥
नारायणम् निराकारम् नरवीरम् नरोत्तमम् ।
नृसिंहम् नागनाथम् च तम् वन्दे नरकांत्तकम् ॥ २ ॥
पीतांबरम् पद्मनाभम् पद्माक्षम् पुरुषोत्तमम् ।
पवित्रम् परमानन्दम् तम् वन्दे परमेश्वरम् ॥ ३ ॥
राघवम् रामचन्द्रम् च रावणारिम् रमापतिम् ।
राजीवलोचनम् रामम् तम् वन्दे रघुनन्दनम् ॥ ४ ॥
वामनम् विश्वरूपम् च वासुदेवम् च विठ्ठलम् ।
विश्वेश्वरम् विभुम् व्यासम् तम् वन्दे वेदवल्लभम् ॥ ५ ॥
दामोदरम् दिव्यसिंहम् दयालुम् दीननायकम् ।
दैत्यारिम् देवदेवेशम् तम् वन्दे देवकी-सुतम् ॥ ६ ॥
मुरारिम् माधवम् मत्स्यम् मुकुन्दम् मुष्टिमर्दनम् ।
मुञ्जकेशम् महाबाहुम् तम् वन्दे मधुसूदनम् ॥ ७ ॥
केशवम् कमलाकान्तम् कामेशम् कौस्तुभप्रियम् ।
कौमोदकीधरम् कृष्णम् तम् वन्दे कौरवान्तकम् ॥ ८ ॥
भूधरम् भुवनानन्दम् भूतेशम् भूतनायकम् ।
भावनैकम् भुजंगेशम् तम् वन्दे भवनाशनम् ॥ ९ ॥
जनार्दनम् जगन्नाथम् जगज्जड्यविनाशकम् ।
जामदग्न्यम् वरम् ज्योति: तम् वन्दे जलशायिनम् ॥ १० ॥
चतुर्भुजम् चिदानन्दम् चाणुरमल्लमर्दनम् ।
चराचरगतम् देवम् तम् वन्दे चक्रपाणिनम् ॥ ११ ॥
श्रिय: करम् श्रियो नाथम् श्रीधरम् श्रीवरप्रदम् ।
श्रीवत्सलधरम् सौम्यं तम् वन्दे श्रीसुरेश्वरम् ॥ १२ ॥
योगीश्वरम् यज्ञपतिम् यशोदानन्ददायकम् ।
यमुनाजलकल्लोलम् तम् वन्दे यदुनायकम् ॥ १३ ॥
शालिग्रामम् शिलाशुद्धम् शंखचक्रोपशोभितम् ।
सुरासुरैस्सदा सेव्यम् तम् वन्दे साधुवल्लभम् ॥ १४ ॥
त्रिविक्रमम् तपोमूर्तिम् त्रिविधाघौघनाशनम् ।
त्रिस्थलम् तीर्थराजेन्द्रम् तम् वन्दे तुलसीप्रियम् ॥ १५ ॥
अनन्तम् आदिपुरुषम् अच्युतम् च वरप्रदम् ।
आनन्दम् च सदानन्दम् तम् वन्दे च अघनाशनम् ॥ १६ ॥
लीलयोद्धृतभूभारम् लोकसत्त्वैकवंदितम् ।
लोकेश्वरम् च श्रीकांतम् तम् वन्दे लक्ष्मणप्रियम् ॥ १७ ॥
हरिम् च हरिणाक्षम् च हरिनाथम् हरिप्रियम् ।
हलायुधसहायम् च तम् वन्दे हनुमत्पतिम् ॥ १८ ॥
हरिनामकृता माला पवित्रा पापनाशिनी ।
बलिराजेंद्रेण चोक्ता कण्ठे धार्या प्रयत्नत: ॥ १९ ॥
इति बलिराजेन्द्रेणोक्तम् हरिनाममालास्तोत्रम् संपूर्णम्
Friday, September 14, 2018
श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्रम्
करारविन्देन पदार्विन्दं मुखार्विन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि।।
जिन्होंने अपने करकमल से चरणकमल को पकड़ कर उसके अंगूठे को अपने मुखकमल में डाल रखा है और जो वटवृक्ष के एक पर्णपुट (पत्ते के दोने) पर शयन कर रहे हैं, ऐसे बाल मुकुन्द का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्रम्
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।
जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।
हे जिह्वे ! तू ‘श्रीकृष्ण ! गोविन्द ! हरे ! मुरारि ! हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव ! तथा गोविन्द ! दामोदर ! माधव !’–इस नामामृत का ही निरन्तर प्रेमपूर्वक पान करती रह।
विक्रेतुकामाकिलगोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्ति:।
दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति।।
जिनकी चित्तवृत्ति मुरारि के चरणकमलों में लगी हुई है, वे सभी गोपकन्याएं दूध-दही बेचने की इच्छा से घर से चलीं। उनका मन तो मुरारि के पास था; अत: प्रेमवश सुध-बुध भूल जाने के कारण ‘दही लो दही’ इसके स्थान पर जोर-जोर से ‘गोविन्द ! दामोदर ! माधव !’ आदि पुकारने लगीं।
गृहे गृहे गोपवधूकदम्बा: सर्वे मिलित्वा समवाप्य योगम्।
पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।
व्रज के प्रत्येक घर में गोपांगनाएं एकत्र होने का अवसर पाने पर झुंड-की-झुंड आपस में मिलकर उन मनमोहन माधव के ‘गोविन्द, दामोदर, माधव’ इन पवित्र नामों को नित्य पढ़ा करती हैं।
जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि।
समस्त भक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति।।
समस्त भक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति।।
हे जिह्वे ! तू सदा ही श्रीकृष्णचन्द्र के ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन मनोहर मंजुल नामों को, जो भक्तों के समस्त संकटों की निवृत्ति करने वाले हैं, भजती रह।
सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णो: प्रवदन्ति मर्त्या:।ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति।।
अपने घर में ही सुख से शय्या पर शयन करते हुए भी जो लोग ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन विष्णुभगवान के पवित्र नामों को निरन्तर कहते रहते हैं, वे निश्चय ही भगवान की तन्मयता प्राप्त कर लेते हैं।
सुखावसाने इदमेव सारं दु:खावसाने इदमेव ज्ञेयम्।
देहावसाने इदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।
देहावसाने इदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।
सुख के अंत में यही सार है, दु:ख के अंत में यही गाने योग्य है और शरीर का अंत होने के समय भी यही मन्त्र जपने योग्य है, कौन-सा मन्त्र? यही कि ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’
श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धननाथ विष्णो।
जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।
जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।
हे जिह्वे ! तू ‘श्रीकृष्ण ! राधारमण ! व्रजराज ! गोपाल ! गोवर्धन ! नाथ ! विष्णो ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव !’–इस नामामृत का निरन्तर पान करती रह।
त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति।।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति।।
हे जिह्वे! मैं तुझी से एक भिक्षा मांगता हूँ, तू ही मुझे दे। वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीर का अन्त करने आवें तो बड़े ही प्रेम से गद्गद् स्वर में ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन मंजुल नामों का उच्चारण करती रहना।
जिह्वे रसज्ञे मधुर प्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि।
आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति।।
आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति।।
हे रसों को चखने वाली जिह्वे ! तुझे मीठी चीज बहुत अधिक प्यारी लगती है, इसलिए मैं तेरे हित की एक बहुत ही सुन्दर और सच्ची बात बताता हूँ। तू निरन्तर ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन मधुर मंजुल नामों की आवृत्ति किया कर।
अग्रे कुरूणाम् अथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृत-वस्त्र-केशा ।
कृष्णा तदाक्रोशत् अनन्यनाथागोविन्द दामोदर माधवेति ।।
जिस समय कौरव और पांडवो के सामने भरी हुई सभा मैं दुशासन ने द्रौपदी के वस्त्र और बालों को पकड़कर खींचा , तब उस समय उसका ( द्रौपदी ) का कोई दूसरा नाथ नहीं है ऐसी द्रौपदी ने रोकर पुकारा - हे गोविन्द, हे दामोदर, हे माधव .
कृष्ण विष्णो मधु-कैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे ।
त्रायस्व मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
त्रायस्व मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
हे कृष्ण, हे विष्णु , हे मधुकेटभ को मारने वाले , हे भगतों पर अनुकम्पा करने वाले , हे भगवान , हे मुरारी , हे केशव , हे लोकेश्वर , हे गोविन्द , हे दामोदर , हे माधव , मेरी रक्षा करो , रक्षा करो
उलूखले सम्भृत-तन्डुलांश्च सैघट्टयन्त्यो मुसलैः प्रमुग्धाः ।
गायन्ति गोप्यो जनितानुरागा गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
ओखली मे धान भरे हुए हैं । उन्हें गोप - रमणियाँ मूसलों से कूट रही हैं । और कूटते कूटते कृष्ण प्रेम मे विभोर होकर , गोविन्द , दामोदर, माधव .इस प्रकार गायन करती जाती हैं ।
काचित् कराम्भोज-पुटे निषण्णं क्रीडा-शुकं किंशुक-रक्त-तुण्डम् ।
अध्यापयामास सरोरुहाक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
कोई कमलनयनी मनोविनोद के लिये पाले हुए अपने कर कमल पर बैठे किंशुककुसुम ( पलाश के पौधे ) के समान रक्तवर्ण चोंच वाले सुग्गे ( तोता )को पड़ा रही थी । पड़ो तो तोता गोविन्द , दामोदर, माधव कहने लगा .
पर्य्यण्किकाभाजम् अलम् कुमारं प्रस्वापयन्त्योऽखिल-गोप-कन्याः ।
जगुः प्रबन्धं स्वर-ताल-बन्धं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
जगुः प्रबन्धं स्वर-ताल-बन्धं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
पालने मे पौड़े हुए अपने नन्हें बच्चे को सुलाती हुई सभी गोपकन्याएँ ताल स्वर के साथ गोविन्द , दामोदर , माधव, इस पद को गाती जाती थी ।
रामानुजं वीक्षण-केलि-लोलं गोपि गृहीत्वा नव-नीत-गोलम् ।
आबालकं बालकम् आजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
हाथों मे माखन का गोला लेकर मैया जशोदा ने आँखमिछोनी क्रीड़ा मे व्यस्त बलराम के छोटे भाई कृष्ण को बालकों के बीच में से पकड़ कर पुकारा अरे गोविन्द , अरे दामोदर , अरे माधव ।
विचित्र-वर्णाभरणाभिरामेऽभिधेहिऽवक्त्राम्बुज-राजहंसे ।
सदा मदीये रसनेऽग्र-रङ्गे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
विचित्र वर्णमय आभरणों से अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होने वाली है. मुखकमल की राजहंसीरूपिणी मेरी रसने तू सर्वप्रथम गोविन्द , दामोदर , माधव इस ध्वनी का ही विस्तार कर ।
अङ्काधिरूढं शिशु-गोप-गूढं स्तनं धयन्तं कमलैक-कान्तम् ।
सम्बोधयामास मुदा यशोदा गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
अपनी गोद मैं बैठकर दूध पीते हुए बालगोपाल रूपधारी भगवान लक्ष्मीकान्त को लक्ष्य करके प्रेमानन्द मे मगन हुई जशोदा मैया इस प्रकार बुलाती करती थी . ऐ मेरे गोविन्द , ऐ गोविन्द , ऐ माधव ज़रा बोलो तो सही ।
क्रीडन्तम् अन्तर्-व्रजम् आत्मनं स्वं समं वयस्यैः पशु-पाल-बालैः ।
प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
अपने सामवयस्क गोपबालकौं के साथ गौष्ठ में खेलते हुए अपने पुत्र कृष्ण यशोदा मैया ने अत्यंत स्नेह के साथ पुकारा . हे गोविन्द , हे मुरारी , हे माधव ( कहाँ चला गया ).
यशोदया गाढम् उलूखलेन गो-कण्ठ-पाशेन निबध्यमानम् ।
रुरोद मन्दं नवनीत-भोजी गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
अधिक चपलता करने के कारण मैया ने गौ बाँधने वाली रस्सी से ख़ूब कसकर ओखली में उन घनश्याम को बॉध दिया . तब तो वे माखन भोगी कृष्ण धीरे धीरे ( आँखे मलते हुए ) सिसक सिसककर गोविन्द, दामोदर , माधव कहते हुए रोने लगे
निजाङ्गणे कङ्कण-केलि-लोलं गोपी गृहीत्वा नवनीत-गोलम् ।
आमर्दयत् पाणि-तलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
श्री नन्दनंदन अपने ही घर के आँगन मे अपने हाथ के कंक्ण ( कंगन ) से खेलने में लगे हुए है . उसी समय मैया ने धीरे से जाकर उनके कमलनयनों को जाकर अपनी हथेली से मूँद तथा दूसरे हाथ में नवनीत का गोल लेकर प्रेम पूर्वक कहने लगी गोविन्द , दामोदर , माधव ( लो देखो माखन खा लो )
मन्दार-माले वदनाभिरामं बिम्बाधरे पूरित-वेणु-नादम्।
गो-गोप-गोपी जन-मध्य-संस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
जिनका मुखारबिंद बड़ा ही मनोहर हे । जी अपने बिम्ब के समान अरूण अधरों पर रखकर वंशी की मधुर धुन कर रहे हैं तथा जो कदम्ब के तले गौ, गोप और गोपियों के मध्य में विराजमान । उन भगवन का हे गोविन्द , हे दामोदर , हे माधव इस प्रकार कहते हुए सदा स्मरण करना चाहिये
क्रीडन्तम् अन्तर्-व्रजम् आत्मनं स्वं समं वयस्यैः पशु-पाल-बालैः ।
प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
अपने सामवयस्क गोपबालकौं के साथ गौष्ठ में खेलते हुए अपने पुत्र कृष्ण यशोदा मैया ने अत्यंत स्नेह के साथ पुकारा . हे गोविन्द , हे मुरारी , हे माधव ( कहाँ चला गया ).
यशोदया गाढम् उलूखलेन गो-कण्ठ-पाशेन निबध्यमानम् ।
रुरोद मन्दं नवनीत-भोजी गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
अधिक चपलता करने के कारण मैया ने गौ बाँधने वाली रस्सी से ख़ूब कसकर ओखली में उन घनश्याम को बॉध दिया . तब तो वे माखन भोगी कृष्ण धीरे धीरे ( आँखे मलते हुए ) सिसक सिसककर गोविन्द, दामोदर , माधव कहते हुए रोने लगे
निजाङ्गणे कङ्कण-केलि-लोलं गोपी गृहीत्वा नवनीत-गोलम् ।
आमर्दयत् पाणि-तलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
श्री नन्दनंदन अपने ही घर के आँगन मे अपने हाथ के कंक्ण ( कंगन ) से खेलने में लगे हुए है . उसी समय मैया ने धीरे से जाकर उनके कमलनयनों को जाकर अपनी हथेली से मूँद तथा दूसरे हाथ में नवनीत का गोल लेकर प्रेम पूर्वक कहने लगी गोविन्द , दामोदर , माधव ( लो देखो माखन खा लो )
मन्दार-माले वदनाभिरामं बिम्बाधरे पूरित-वेणु-नादम्।
गो-गोप-गोपी जन-मध्य-संस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
जिनका मुखारबिंद बड़ा ही मनोहर हे । जी अपने बिम्ब के समान अरूण अधरों पर रखकर वंशी की मधुर धुन कर रहे हैं तथा जो कदम्ब के तले गौ, गोप और गोपियों के मध्य में विराजमान । उन भगवन का हे गोविन्द , हे दामोदर , हे माधव इस प्रकार कहते हुए सदा स्मरण करना चाहिये
उत्थाय गोप्योऽपर-रात्र-भोगे स्मृत्वा यशोदा-सुत-बाल-केलिम् ।
गायन्ति प्रोच्चैः दधि-मन्थयन्त्यो गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
व्रजाड्गनाएँ ब्राह्ममुहूर्त मे उठकर और उन यशुमतीनन्दन की बाल क्रीड़ाओं की बातों को
याद करके दही मथते मथते गोविन्द , दामोदर, माधव । इन पदों को उच्च स्वर से गाया करती है
जग्धोऽथ दत्तो नवनीत-पिण्डो गृहे यशोदा विचिकित्सयन्ती ।
उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
दधि मथकर माता ने माखन का लौदाँ रख दिया था। माखन भोगी क्रष्ण की दृष्टि पड़ गयी , झट से उठा लाये . कुछ खाया कुछ बाँट दिया । जब ढूँढते ढूँढते नहीं मिला तो यशोदा मैया ने आप (कृष्ण) पर संदेह करते हुए पूछा हे मुरारी, हे गोविन्द , हे माधव सही सही बता माखन के लौंदा का क्या हुआ
अभ्यर्च्य गेहं युवतिः प्रवृद्ध-प्रेम-प्रवाहा दधि निर्ममन्थ ।
गायन्ति गोप्योऽथ सखी-समेता गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
जिसके ह्रदय मैं प्रेम की बाड़ आ रही है , ऐसी माता
यशोदा घर को लीपकर दही को मथने लगी । तब और सब गोपांगनाए तथा सखियाँ मिलकर गोविन्द , दामोदर , माधव , इस पद का गान करने लगीं
क्वचित् प्रभाते दधि-पूर्ण-पात्रे निक्षिप्य मन्थं युवती मुकुन्दम् ।
आलोक्य गानं विविधं करोति गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
किसी दिन प्रातः काल ज्यों ही माता यशोदा दही भरे भांडे मे मथानी को छोड़कर उठी त्यों ही उसकी
दृष्टि शैया पर बैठे हुए मनमोहन मुकुंद पर पड़ी । सरकार को देखते ही वह प्रेम से पगली हो गयी । और मेरा गोविन्द , मेरा माधव , मेरा मुरारी ऐसा कहकर तरह तरह से गाने लगी.
Sunday, July 29, 2018
|| शिव ताण्डव स्तोत्रम् ||
( रावणकृत )
।ऽ।ऽ-।ऽ।ऽ-ऽ।ऽ-।ऽ।ऽ-ऽ।ऽ-।ऽ।ऽ
पञ्चचामर छन्द
यह छन्द चार चरण का वर्णिक छन्द है जिसके प्रत्येक चरण में लघु गुरु के क्रम से 16 वर्ण / अक्षर होते हैं ।।ऽ।ऽ-।ऽ।ऽ-ऽ।ऽ-।ऽ।ऽ-ऽ।ऽ-।ऽ।ऽ
जटाटवी–गलज्जल–प्रवाह–पावित–स्थले
गलेऽव–लम्ब्य–लम्बितां–भुजङ्ग–तुङ्ग–मालिकाम्
डमड्डमड्डमड्डम–न्निनादव–ड्डमर्वयं
चकार–चण्ड्ताण्डवं–तनोतु–नः शिवः शिवम् ॥ १ ॥
शब्दार्थ:
लम्बित = लटकना, hanging by, support or resting on
तुङ्ग = शक्तिशाली, strong
भुजङ्ग = सर्प, serpent, snake
डमर = कोलाहल, tumult
चकार = 'च' , letter or sound ca
तनोति = प्रकट, manifest
जिन शिव जी की सघन जटारूप वन से प्रवाहित हो गंगा जी की धारायं उनके कंठ को प्रक्षालित होती हैं, जिनके गले में बडे एवं लम्बे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें ।
जटा–कटा–हसं–भ्रमभ्रमन्नि–लिम्प–निर्झरी-
–विलोलवी–चिवल्लरी–विराजमान–मूर्धनि
धगद्धगद्धग–ज्ज्वल–ल्ललाट–पट्ट–पावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ २ ॥
जिन शिव जी के जटाओं में अतिवेग से विलास पुर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरे उनके शिश पर लहरा रहीं हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें धधक-धधक करके प्रज्वलित हो रहीं हैं, उन बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी में मेरा अंनुराग प्रतिक्षण बढता रहे।
धरा–धरेन्द्र–नंदिनीविलास–बन्धु–बन्धुर
स्फुर–द्दिगन्त–सन्ततिप्रमोद–मान–मानसे
कृपा–कटाक्ष–धोरणी–निरुद्ध–दुर्धरापदि
क्वचि–द्दिगम्बरे–मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ ३ ॥
जो पर्वतराजसुता(पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनके कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आन्दित रहे।
जटा–भुजङ्ग–पिङ्गल–स्फुरत्फणा–मणिप्रभा
कदम्ब–कुङ्कुम–द्रवप्रलिप्त–दिग्व–धूमुखे
मदान्ध–सिन्धुर–स्फुरत्त्व–गुत्तरीय–मे–दुरे
मनो विनोदमद्भुतं–बिभर्तु–भूतभर्तरि ॥ ४ ॥
मैं उन शिवजी की भक्ति में आन्दित रहूँ जो सभी प्राणियों की के आधार एवं रक्षक हैं, जिनके जाटाओं में लिपटे सर्पों के फण की मणियों के प्रकाश पीले वर्ण प्रभा-समुहरूपकेसर के कातिं से दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और जो गजचर्म से विभुषित हैं।
सहस्रलोचनप्रभृत्य–शेष–लेख–शेखर
प्रसून–धूलि–धोरणी–विधू–सराङ्घ्रि–पीठभूः
भुजङ्गराज–मालया–निबद्ध–जाटजूटक:
श्रियै–चिराय–जायतां चकोर–बन्धु–शेखरः ॥ ५ ॥
जिन शिव जी का चरण इन्द्र-विष्णु आदि देवताओं के मस्तक के पुष्पों के धूल से रंजित हैं (जिन्हे देवतागण अपने सर के पुष्प अर्पन करते हैं), जिनकी जटा पर लाल सर्प विराजमान है, वो चन्द्रशेखर हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।
ललाट–चत्वर–ज्वलद्धनञ्जय–स्फुलिङ्गभा-
निपीत–पञ्च–सायकं–नमन्नि–लिम्प–नायकम्
सुधा–मयूख–लेखया–विराजमान–शेखरं
महाकपालि–सम्पदे–शिरो–जटालमस्तु नः॥ ६ ॥
जिन शिव जी ने इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए, कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म कर दिया, तथा जो सभि देवों द्वारा पुज्य हैं, तथा चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं, वे मुझे सिद्दी प्रदान करें।
कराल–भाल–पट्टिका–धगद्धगद्धग–ज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृत–प्रचण्डपञ्च–सायके
धरा–धरेन्द्र–नन्दिनी–कुचाग्रचित्र–पत्रक
प्रकल्प–नैकशिल्पिनि–त्रिलोचने–रतिर्मम ॥ ७ ॥
जिनके मस्तक से धक-धक करती प्रचण्ड ज्वाला ने कामदेव को भस्म कर दिया तथा जो शिव पार्वती जी के स्तन के अग्र भाग पर चित्रकारी करने में अति चतुर है ( यहाँ पार्वती प्रकृति हैं, तथा चित्रकारी सृजन है), उन शिव जी में मेरी प्रीति अटल हो।
नवीन–मेघ–मण्डली–निरुद्ध–दुर्धर–स्फुरत्
कुहू–निशी–थिनी–तमः प्रबन्ध–बद्ध–कन्धरः
निलिम्प–निर्झरी–धरस्त–नोतु कृत्ति–सिन्धुरः
कला–निधान–बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥ ८ ॥
जिनका कण्ठ नवीन मेंघों की घटाओं से परिपूर्ण आमवस्या की रात्रि के समान काला है, जो कि गज-चर्म, गंगा एवं बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा जो कि जगत का बोझ धारण करने वाले हैं, वे शिव जी हमे सभी प्रकार की सम्पन्नता प्रदान करें।
प्रफुल्ल–नीलपङ्कज–प्रपञ्च–कालिमप्रभा-
–वलम्बि–कण्ठ–कन्दली–रुचिप्रबद्ध–कन्धरम् .
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ ९ ॥
शब्दार्थ:
स्मर = कामदेव
पुर = त्रिपुरासुर
भव = जीवन-मरण चक्र
जिनका कण्ठ और कन्धा पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई सुन्दर श्याम प्रभा से विभुषित है, जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दु:खो के काटने वाले, दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर एवं अन्धकासुर के संहारक हैं तथा जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ |
अखर्वसर्व–मङ्गलाकला–कदंबमञ्जरी
रसप्रवाह–माधुरी विजृंभणा–मधुव्रतम् .
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ १० ॥
जो कल्यानमय, अविनाशि, समस्त कलाओं के रस का अस्वादन करने वाले हैं, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, त्रिपुरासुर, गजासुर, अन्धकासुर के सहांरक, दक्षयज्ञविध्वसंक तथा स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ।
जयत्व–दभ्र–विभ्र–म–भ्रमद्भुजङ्ग–मश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रम–स्फुरत्कराल–भाल–हव्यवाट्
धिमिद्धिमिद्धिमि ध्वनन्मृदङ्ग–तुङ्ग–मङ्गल
ध्वनि–क्रम–प्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ ११ ॥
अतयंत वेग से भ्रमण कर रहे सर्पों के फूफकार से क्रमश: ललाट में बढी हूई प्रचंण अग्नि के मध्य मृदंग की मंगलकारी उच्च धिम-धिम की ध्वनि के साथ ताण्डव नृत्य में लीन शिव जी सर्व प्रकार सुशोभित हो रहे हैं।
दृष–द्विचित्र–तल्पयोर्भुजङ्ग–मौक्ति–कस्रजोर्
–गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि–पक्षपक्षयोः .
तृष्णार–विन्द–चक्षुषोः प्रजा–मही–महेन्द्रयोः
समप्रवृतिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥ १२ ॥
कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या, सर्प एवं मोतियों की मालाओं, बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टूकडों, शत्रू एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं, तिनकों तथा कमलों पर सामान दृष्टि रखने वाले शिव को मैं भजता हूँ।
कदा निलिम्प–निर्झरीनिकुञ्ज–कोटरे वसन्
विमुक्त–दुर्मतिः सदा शिरःस्थ–मञ्जलिं वहन् .
विमुक्त–लोल–लोचनो ललाम–भाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥ १३ ॥
कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करता हुआ, निष्कपट हो, सिर पर अञ्जलि धारण कर चञ्चल नेत्रों तथा ललाट वाले शिव जी का मन्त्रोच्चार करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा।
इदम् हि नित्य–मेव–मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि–मेति–संततम् .
हरे गुरौ सुभक्तिमा शुयातिना न्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥ १४ ॥
इस उत्त्मोत्त्म शिव ताण्डव स्त्रोत को नित्य पढने या श्रवण करने मात्र से प्राणी पवित्र हो, परमगुरू शिव में स्थापित हो जाता है तथा सभी प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो जाता है।
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे .
तस्य स्थिरां रथ गजेन्द्र तुरङ्ग युक्तां
लक्ष्मीं सदैवसुमुखिं प्रददाति शंभुः ॥ १५ ॥
प्रात: शिवपुजन के अंत में इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोडा आदि सम्पदा से सर्वदा युक्त रहता है।
***************************************
Labels:
shiv,
shiv tandav,
stotram,
छन्द,
ताण्डव,
पञ्चचामर,
रावण,
शिव ताण्डव,
स्तोत्रम्
Subscribe to:
Posts (Atom)